“सबसे आखिरी बेंच”

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सबसे-आखिरी-बेंच

“क्या कभी आप पुराने समय के बारे में सोचते हो?”
“क्यों पूछ रही हो? क्या हुआ?”
“नहीं, ऐसे ही पूछ लिया। क्योंकि कभी-२ अकेले में रात में सोने से पहले मेरी आँखों के सामने वो प्यारा सा समय आ जाता है।”
“ऐसा क्या था उस समय में?”
“कुछ नहीं, बस यूं ही।”
“अरे बताओ तो क्या हुआ?”
“वही सबसे पीछे वाली बेंच पर मुस्कुराते हुए आप जब अपने दोस्तों में खोए रहते थे और हम चाहते थे कि फकत एक बार तो ये देख लें।”
“ओहो, फिर वही पुरानी बातें यार। अब खत्म भी करो।”
“नहीं होती न। अच्छा आप सबसे पीछे ही क्यों बैेठते थे?
“क्लास में सबसे पीछे दायीं तरफ बैठकर अच्छा लगता था। पुरानी आदत है। वहां बैठकर पूरे क्लास की गतिविधियों पर नियंत्रण रहता था और सुरक्षित महसूस होता था।”
“हम भी पलट-२ कर निहारते थे तुमको, जब तुम वही अपनी बचकानी हरकतें करते थे तो बड़ा प्यार आता था। अब भी हसी आ जाती है उन हरकतों पर। क्यों परेशान करते थे सबको?”
“पता नहीं क्यों?, तुम्हें तो नहीं किया न परेशान?”
“किया तो। तब गुस्सा आता था अब उन बातों को सोचकर प्यार आता है। चाहते हैं कि वो वक़्त सहेज लें। हम दोनों तो एक सिक्के के बिल्कुल दो पहलू थे, हमारी कभी नहीं बनी। पता नहीं क्या हुआ ऐसा जो तुमसे इश्क़ हो गया।”
“कुछ नहीं।”
“कुछ नहीं” मतलब?, आप कुछ भी कहते-२ “कुछ नहीं” कहकर बात क्यों टालते हो?”
“अरे अब क्या बताएं, तुम्हे याद है जब तुमने कहा था कि हम दोनों में अंतर इतना गहरा हो जाता है कि मैं सहज ही नहीं हो पाती आपके साथ। याद है?”
“याद है फिर आपने कहा था कि हम दोनों में चाहे लाखों अंतर हो लेकिन एक समानता भी है और वह है,’हमारी मासूमियत।’ मुझे याद है।”
“मैं समुद्र की लहरों सा चंचल हूँ और तुम किनारों सी स्थिर हो। मैं उन लहरों की कल-कल ध्वनि सा गुंजित हूँ और तुम उन्हीं किनारों की खामोशी समेटे हुए हो। लेकिन एक मासूमियत है तुममें जिसमें मुझे अपनापन लगता है।”
“कितनी बकवास सुनते रहते हो मेरी, पता नहीं कैसे झेल लेते हो?”
“सच कहूं तो तुम्हारी सांस और तुम्हारे झुमकों की आवाज को भी मैं घण्टों-२ सुन सकता हूँ। कितना सुकून देते हैं ये रात के समय।”
“आप भी न। अब बस करो।”
“ये जो तुम शर्माते हुए आप भी न कहती हो इस पर तो सरकार को बैन लगा देना चाहिए। सबसे जानलेवा यही है।”
“आप भी न, अरे अरे। क्या करें आदत है और आप बोल ही कुछ ऐसा देते हो कि बोलना पड़ जाता है। अब फिर क्या कहें? बैन तो आपकी तारीफों पर लगाना चाहिए, जो आप करते हैं। अब ये मत कहना कि अच्छी नहीं लगती। हमें अच्छी लगती है लेकिन क्या करें, छोड़ो, कुछ नहीं।”
“Ahahaha! अब क्यों बोल दिया ये ‘कुछ नहीं’ तुमने। आखिरी बेंच से शुरू हुई बात को कहाँ तक लेकर आ गईं।”
“तारीफ सुनना अच्छा लगता है न हमें।”🙈

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